शहरी नक्सलवाद:बौद्धिक आतंकवाद

अजय कुमार रवानी
स्नाकोत्तर भौतिकी
बीएड आरएसपी कॉलेज झरिया

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

कथित माओवादी लिंक के कारण पिछले साल पुणे की पुलिस ने जनवरी में हुए भीमा कोरेगाँव दंगों के मामले में पाँच लोगों को गिरफ्तार किया है जिससे एक बार फिर “शहरी नक्सलवाद” की अवधारणा पर बहस शुरू हो गई है। इस समस्या की खतरनाक स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस के मुताबिक नक्सलियों के पास से एक चिट्ठी भी बरामद हुई है जिसमें प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश की बात सामने आई है। शहरी नक्सलवाद हमारे देश के युवाओं को देश के ही खिलाफ भड़का रहा है। इस समस्या को शहरी नक्सलवाद के नाम से जाना जाता है। सुरक्षा प्रतिष्ठानों का मानना ​​है कि माओवाद का पुराना हो चुका नेतृत्व अब शहरों और कस्बों की ओर देख रहा है।

नक्सलवाद की उत्पत्ति

भारत में नक्सल हिंसा की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुई। इसके नेतृत्वकर्त्ता चारू मजूमदार तथा कानू सान्याल को माना जाता है।कहा जाता है कि शहरी नक्सलवाद की शुरुआत 80 के दशक में हुई थी जब नक्सलवाद ने शिक्षा के केंद्रों में अपनी जड़ें जमानी शुरू की और 2004 के आते-आते अपनी गतिविधियों को बदलकर बौद्धिक स्तर पर जंग छेड़ी।2004 में सीपीआई (माओवादी) का गठन सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) तथा माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय के साथ हुआ था।इसने तीन अलग-अलग रणनीतियों के माध्यम से भारत में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित संसदीय स्वरुप को उखाड़ फेंकने के लिये एक हिंसक विचारधारा का समर्थन किया जिसमें शामिल हैं:
अपने लोगों को पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) में भर्ती करना।
माओवादियों का लक्ष्य देश के विभिन्न क्षेत्रों पर कब्ज़ा करना है और धीरे-धीरे शहरी केंद्र को घेरना है।
शहरी आबादी के कुछ लक्षित वर्गों को संगठित करने, पेशेवर क्रांतिकारियों की भर्ती, विद्रोह के लिये धन जुटाने, भूमिगत कार्यकर्त्ताओं के लिये शहरी आश्रय बनाने हेतु मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में यह ‘फ्रंट संगठन’ के रूप में भी जाना जाता है।
इन संगठनों में अकादमिक और ऐसे कार्यकर्त्ता शामिल होते हैं, जो ज़्यादातर मानव अधिकार गैर-सरकारी संगठनों के अंतर्गत काम करते हैं और सीपीआई (माओवादी) पार्टी की संरचना से व्यवस्थित रूप से जुड़े होते हैं लेकिन कानूनी उत्तरदायित्व से बचने के लिये अलग पहचान बनाए रखते हैं।नक्सलवाद का सीधा संबंध वामपंथ से है। नक्सलवाद के समर्थक चीनी साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग के विचारों को आदर्श मानते हैं।यह आंदोलन चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग की नीतियों का अनुगामी था (इसीलिये इसे माओवाद भी कहा जाता है) और आंदोलनकारियों का मानना था कि भारतीय मज़दूरों तथा किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ ज़िम्मेदार हैं।धीरे-धीरे मध्यवर्ती भारत के कई हिस्सों में नक्सली गुटों का प्रभाव तेज़ी से बढ़ने लगा। इनमें झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं।यह वही नक्सलवाद है जिसने युवाओं की सोच को किस तरह दूषित किया है इसका उदाहरण जेएनयू, जाधवपुर और उस्मानिया विश्वविद्यालयों में देखने को मिला है।सीपीआई (माओवादी) पार्टी तथा इससे जुड़े सभी संगठनों को गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत आतंकवादी संगठनों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

अर्बन या शहरी नक्सलवाद क्या है?

देश की पीढ़ी को भारत की संस्कृति से अलग करने की कोशिश को शहरी नक्सलवाद कहा जा सकता है। शहरी नक्सली मुख्यतः चरम वामपंथी, माओवादी विचारधारा के लोग हैं जिनका एक ही एजेंडा है हिंदुस्तान के खिलाफ काम करना।

2004 में ‘शहरी परिप्रेक्ष्य: हमारे कार्य में शहरी क्षेत्र’ नामक एक सीपीआई (माओवादी) दस्तावेज़ शहरी नक्सलवादी रणनीति पर विस्तारित था। मुख्य रूप से इसने शहरी क्षेत्रों का नेतृत्व और विशेषज्ञता हासिल करने पर ध्यान देने के साथ औद्योगिक श्रमिकों तथा शहरी गरीबों को संगठित करने, अग्रणी संगठनों की स्थापना, छात्रों, मध्यम वर्ग के कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों, महिलाओं, दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों समेत समेकित संगठनों के ‘कुशल संयुक्त मोर्चों’ का निर्माण करने तथा कर्मियों को तकनीकी सामग्री तथा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने के साथ ही सैन्य गतिविधियों में शामिल होने पर ज़ोर दिया।

खुफिया रिपोर्ट से पता चलता है कि ‘शहरी नक्सलवाद’ का समर्थन करने वाले अग्रणी संगठन दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चंडीगढ़, रांची, हैदराबाद, विशाखापत्तनम, मदुरै, तिरुवनंतपुरम, नागपुर और पुणे समेत कई शहरों में सक्रिय हैं। इनमें वकील, लेखक, मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता शामिल हैं जिनकी समय-समय पर गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं। हालाँकि सरकार या सरकारी एजेंसियों की तरफ से अर्बन नक्सल को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है।

शहरी नक्सलवाद के मामले में शहर में रहने वाले शिक्षित व्यक्ति नक्सलियों को कानूनी और बौद्धिक समर्थन प्रदान करते हैं। शहरी नक्सली भारत के ‘अदृश्य दुश्मन’ हैं, उनमें से कुछ को या तो गिरफ्तार किया जा चुका है या नक्सली गतिविधियों तथा भारतीय राज्य के खिलाफ विद्रोह फैलाने के लिये पुलिस रडार पर रखा गया है।शहरों में नक्सलवाद के बढ़ने का सबसे पहला मामला केरल में दिखाई दिया था जब एक नक्सली वर्ग को पुलिस ने पकड़ा था। फिर यह बात निकलकर सामने आई कि अब नक्सली अपना नेटवर्क शहरों में फैला रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सलवाद के पीछे जो विचारधारा है उसको प्रोत्साहित करने वाले लोग शहरों में छिपे बैठे हैं और अपनी गतिविधियों को शहरों से ही अंजाम दे रहे हैं।शहरी नक्सलियों का मुख्य एजेंडा शहरों में नक्सलवाद का गुणगान करना और लोगों को नक्सली विचारधारा से जोड़ना है तथा विकास के किसी भी दावे को झुठलाना है।शहरी नक्सलवाद की एक अन्य परिभाषा के अंतर्गत यह एक ऐसी घटना है जिसे एक या अधिक या निम्नलिखित सभी विशेषताओं द्वारा चिह्नित किया किया जा सकता है:
भारतीय अर्थव्यवस्था में बाधा डालकर किसी भी रूप में विकास कार्यों को रोकने का प्रयास (उदाहरण के लिये  बांध निर्माण, परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं आदि के खिलाफ पीआईएल दायर करके)।
देश की शिक्षा व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ (उदाहरण के लिये आरटीई, पाठ्य पुस्तकों में मार्क्सवादी प्रचार आदि)।
देश की कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना
देश की सुरक्षा व्यवस्था में हस्तक्षेप
देश में हिंदू संस्कृति पर हमला (उदाहरण के लिये हिंदू त्योहारों, रीति-रिवाजों आदि पर हमला)।

सामाजिक-आर्थिक कारणों से उपजा था नक्सलवाद

केंद्र और राज्य सरकारें माओवादी हिंसा को अधिकांश रूप से कानून-व्यवस्था की समस्या मानती रही हैं, लेकिन इसके मूल में गंभीर सामाजिक-आर्थिक कारण भी रहे हैं।

नक्सलियों का यह कहना रहा है कि वे उन आदिवासियों और गरीबों के लिये लड़ रहे हैं, जिनकी सरकार ने दशकों से अनदेखी की है और वे ज़मीन का अधिकार तथा संसाधनों के वितरण के संघर्ष में स्थानीय सरोकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। माओवाद प्रभावित अधिकतर इलाके आदिवासी बहुल हैं और यहाँ जीवनयापन की बुनियादी सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इन इलाकों की प्राकृतिक संपदा के दोहन में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की कंपनियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। यहाँ न सड़कें हैं, न पीने के लिये पानी की व्यवस्था, न शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ और न रोज़गार के अवसर। नक्सलवाद के उभार के आर्थिक कारण भी रहे  हैं। नक्सली, सरकार के विकास कार्यों को चलने ही नहीं देते और सरकारी तंत्र उनसे आतंकित रहता है।  वे आदिवासी क्षेत्रों का विकास नहीं होने, उनके अधिकार न मिलने पर हथियार उठा लेते हैं। इस प्रकार वे लोगों से वसूली करते हैं एवं समांतर अदालतें चलाते हैं।  प्रशासन तक पहुँच न हो पाने के कारण स्थानीय लोग नक्सलियों  के अत्याचार का शिकार होते हैं। अशिक्षा और विकास कार्यों  की उपेक्षा ने स्थानीय लोगों एवं नक्सलियों के बीच गठबंधन को मज़बूत बनाया।जानकार मानते हैं कि नक्सलवादियों की सफलता की वज़ह उन्हें स्थानीय स्तर पर मिलने वाला समर्थन रहा है, जिसमें अब धीरे-धीरे कमी आ रही है।
देश की एकता के लिये शहरी नक्सलवाद बड़ा खतरा

शहरी नक्सलवाद खतरनाक इसलिये है क्योंकि इसने देश भर में लोगों को अपने पक्ष में कर लिया है। इससे केवल हमारी सरकार तथा हमारी सेना नहीं लड़ सकती बल्कि इस लड़ाई को पूरे देश को लड़ना होगा।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि सही मायने में माओवाद को जिंदा रखने वाले बौद्धिक रूप से मज़बूत विचारक कई मायनों में पीपुल लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी से भी ज़्यादा खतरनाक हैं।सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिये हलफनामे में यह भी कहा था कि ये माओवादी विचारक ‘मास ऑर्गेनाइजेशन’ या ‘फ्रंट ऑर्गेनाइजेशन’ के ज़रिये शहरी आबादी के खास लक्षित वर्ग को मोबलाइज़ करने तथा मास ऑर्गेनाइजेशन मानवाधिकार संस्थाओं की आड़ में काम करते हैं।नक्सलवाद का चेहरा कितना भयानक होता जा रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नक्सलवाद ने सरकार के खिलाफ अपनी लड़ाई को और मज़बूत करने के लिये जम्मू-कश्मीर के आतंकियों के साथ हाथ मिला लिया है।ऐसे संगठनों के खिलाफ सीधी लड़ाई हमेशा मुश्किल भरी होती है क्योंकि ऐसे लोग हमारे बीच ही घुले मिले होते हैं इसलिये इनके साथ संवेदनशीलता और भावनाओं के साथ लड़ना पड़ता है।नक्सलवादी, संगठनों को विचारधारा और भावना के साथ जोड़ते हैं इसलिये ऐसे संगठन की विचारधारा और भावना पर हमला बोलना बेहद ज़रूरी है।विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी नक्सलवाद हमारे समाज में शुरुआत से ही बसा हुआ है लेकिन गुज़रे कुछ वर्षों से इसका भयानक चेहरा सामने आने लगा है।देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने की लिये कई सरकारी और गैर -सरकारी संगठन शहरी नक्सलवाद के खिलाफ काम कर रहे हैं।हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में शहरी नक्सलवाद पर एक सेमीनार का आयोजन किया गया। विशेषज्ञों और विद्वानों द्वारा आयोजित इस सेमीनार में शहरी नक्सलवाद पर चर्चा की गई और यह संदेश भी दिया गया कि कैसे हम अपने आस-पास के लोगों को पहचानें।

नक्सलियों का शहरी नेटवर्क

2015 में केरल उच्च न्यायालय ने कहा था कि माओवादी होने और माओवाद की राजनीतिक विचारधारा रखना कोई अपराध नहीं है जब तक कि पुलिस उचित साक्ष्य न प्रस्तुत कर दे कि उसकी गतिविधियाँ गैरकानूनी हैं।

अगर व्यक्ति या संगठन केवल नफरत फ़ैलाने के लिये शारीरिक हिंसा का सहारा लेता है, तो कानूनी एजेंसी उस हिंसा को रोक सकती है अथवा व्यक्ति या संगठन के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।महत्त्वपूर्ण उद्योगों जैसे- संचार, तेल और प्राकृतिक गैस, कोयला, परिवहन, बिजली, रक्षा, उत्पादन इत्यादि में मज़दूर वर्ग द्वारा आंदोलन में प्रवेश किया जाना।गुजरात के सूरत में 2006 से पहले और बाद में कई अन्य औद्योगिक बेल्टों पर माओवादी गतिविधियों का पता लगने से इसकी स्पष्ट रूप से पुष्टि हुई है।शहरी आंदोलन ने छात्रों को देश के विभिन्न हिस्सों में माओवादी गुटों की ओर आकर्षित किया है।सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन संगठनों ने शिक्षा क्षेत्र में भी ज़ोरदार आंदोलन शुरू कर दिया है तथा वे कई प्रतिष्ठित कॉलेजों के छात्रों को इस आंदोलन से जोड़ने में सफल भी हुए हैं। माओवादियों ने स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों और शिक्षकों समेत शहरी बौद्धिक और मध्यम वर्ग के बीच कुछ सहानुभूति और समर्थन प्राप्त कर लिया है।कई अवसरों पर सीपीआई (माओवादी) के महत्त्वपूर्ण शीर्ष स्तर के नेताओं को नागरिक समाज में छिपे शहरों और कस्बों से गिरफ्तार किया गया है।

नक्सली घटनाओं में भारी कमी

गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2017-18 के मुताबिक नक्सल समस्या की स्थिति चिंता का विषय होने के बावजूद हाल के वर्षों में नक्सल समस्या हल करने में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

माओवाद देश के लिये एक संकट है। रिपोर्ट के अनुसार माओवादी घटनाओं में सुरक्षा बलों की हत्याओं में पहले की अपेक्षा 53 से लेकर 55 प्रतिशत तक गिरावट आई है।भौगोलिक क्षेत्र की दृष्टि से भी देखा जाए तो इसमें 40 प्रतिशत की कमी आई है। इस कमी का श्रेय सीआरपीएफ़ के जवानों, पुलिस अधिकारियों तथा पुलिस के जवानों को जाता है।पहले देश के 10 राज्यों के 77 ज़िले नक्सलवाद से प्रभावित थे लेकिन गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, अब सिर्फ 30 ज़िले ही नक्सलवाद से प्रभावित हैं।वर्ष 2013 की तुलना में वर्ष 2017 में नक्सली घटनाओं में 20 प्रतिशत की गिरावट आई है और इन घटनाओं में मौत का आँकड़ा भी 34 प्रतिशत तक कम हुआ है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, देश के 44 ज़िले नक्सल प्रभावित ज़िलों की सूची से हटाए गए हैं। इनमें आंध्र प्रदेश के 3 ज़िले (प्रकाशम, कर्नूल, अनंतपुर), छत्तीसगढ़ के 3 ज़िले (सरगुजा, कुरिया और जसपुर) तथा झारखंड के 2 ज़िले (देवघर, पाकुड़) शामिल हैं। इन 44 ज़िलों में सबसे ज़्यादा तेलंगाना से 19 ज़िलों को नक्सल प्रभावित ज़िलों की सूची से हटाया गया है।केंद्रीय गृह मंत्री ने नक्सलवाद की समस्या के खात्मे की प्रतिबद्धता को दोहराया है।

निष्कर्ष

पुणे पुलिस की कार्रवाई से स्पष्ट है कि शहरी समाज में नक्सलियों के प्रति हमदर्दी रखने के साथ ही उनकी हरसंभव तरीके से मदद करने वाले तत्व सक्रिय हैं। इसका प्रमाण तब मिला था, जब दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईंबाबा को नक्सलियों की मदद के अपराध में सज़ा सुनाई गई थी। नि:संदेह ऐसे तत्त्वों के खिलाफ आरोप साबित करना कठिन है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि शहरी समाज में नक्सलियों के दबे-छिपे मददगार मौजूद नहीं हैं।

गृह मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि वामपंथी चरमपंथी चुनौतियों से निपटने की रणनीति में ‘शहरी नक्सलवाद’ से निपटने की योजना शामिल होनी चाहिये। राज्य सरकारों को माओवादी फ्रंट संगठनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करनी होगी। शहरों में बढ़ते नक्सली गतिविधियों का मुकाबला करने के लिये एक अलग बजट का प्रावधान किया जाना चाहिये। देश का युवा जैसे-जैसे जागरुक हो रहा है वह देश के विकास में भागीदार बनना चाहता है। नक्सलवाद की विचारधारा से उसका मोहभंग हो रहा है।

आज युवाओं का वह तबका जो नक्सलवाद की चपेट में आ गया है, को समझाने की जरुरत है, उसे संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ने की ज़रूरत है और इस काम को करने के लिये समाज को आगे आना होगा।

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